Jharni

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झरनी मिथिलांचल का एक पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसे मुस्लिम समुदाय के पुरुष मुहर्रम के अवसर पर करते हैं। यह नृत्य करबला के शहीदों की याद में किया जाता है और शौर्य, त्याग व भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

नर्तकों के दोनों हाथों में बांस की फट्टी होती है, जिसे बारीक चीरकर बनाया गया होता है — इसी को ‘झरनी’ कहा जाता है। जब ये नर्तक एक-दूसरे पर उन फट्टियों को बजाते हैं, तो एक विशिष्ट आवाज निकलती है, जो युद्ध की टक्कर और उत्सर्ग की भावना को दर्शाती है।
 
झरनी नृत्य में ताल, गति और समर्पण का अनूठा संगम होता है। इसमें पारंपरिक परिधान, ढोल-नगाड़े और मुहर्रम के गीतों की संगति इसे और प्रभावशाली बनाती है।
 
मुख्य विशेषताएँ:
 
विशेष रूप से मुहर्रम पर किया जाने वाला पुरुषों का नृत्य
 
हाथों में बांस की पतली चिरी हुई फट्टी जिसे झरनी कहते हैं
 
इन फट्टियों को आपस में टकराकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है
 
नृत्य में शौर्य, श्रद्धा और शहादत का भाव प्रकट होता है

Performance Info

Folk Dance Of Bihar

Writer :

Padmashree Dr Shanti Jain

Music :

Sitaram Singh

Choreographer:

Jeetendra Kumar