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श्री विश्व बंधु : एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत

बिहार में श्री विश्व बंधु का नाम लोकनृत्य के पर्याय के रूप में प्रतिष्ठित है।

23 नवम्बर 1930 को पटना में जन्मे श्री बंधु ने रचनात्मक नृत्य की शिक्षा प्रसिद्ध नृत्याचार्य पं. उदय शंकर से तथा शास्त्रीय नृत्य की विधिवत् दीक्षा पं. राम जीवन प्रसाद से प्राप्त की। उन्होंने न केवल बिहार के ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक लोकनृत्यों का प्रचार-प्रसार किया, अपितु उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर एक नवीन प्रतिष्ठा प्रदान की। उनकी सृजनशीलता ने इन नृत्य शैलियों को कलात्मक परिष्कार प्रदान करते हुए विलुप्तप्राय रूपों में नवजीवन का संचार किया।

वर्ष 1959 से सतत सक्रिय रहते हुए, उन्होंने बिहार की सांस्कृतिक चेतना में गहरी छाप छोड़ी है। उन्होंने शासकीय सेवा से त्यागपत्र देकर एवं राज्य तथा केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त उच्च पदों को अस्वीकार कर नृत्यकला को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया।

संगीत नाटक अकादमी के अंतर्गत अंतर्राज्यीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं कर्नाटक सहित अनेक राज्यों में बिहार के लोकनृत्य का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने पटना स्थित भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के मंच से अनेक नृत्य-नाटकों का निर्देशन किया एवं विभिन्न नगरों में लोकनृत्य मंडलियों का नेतृत्व कर व्यापक सांस्कृतिक चेतना का प्रसार किया। विदेशों में, विशेषतः अमेरिका सहित कई देशों में उन्होंने भारतीय लोकनृत्य की गरिमा का विस्तार किया।

1959 में उन्होंने ‘सुरांगन’ नामक सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की, जो आज भी उनके मार्गदर्शन में कार्यरत है। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने जनजागरण के उद्देश्य से लोकनाट्यों के माध्यम से ग्रामीण जनसमुदाय को शासन की सामाजिक नीतियों जैसे—जनसंख्या नियंत्रण, स्त्री-पुरुष समानता, स्वच्छता, नारी सम्मान एवं दहेज-उन्मूलन—की ओर प्रेरित किया। भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्धों के समय संस्था द्वारा प्रस्तुत देशभक्ति-प्रधान नृत्यों ने जनमानस को संगठित किया।

सुरांगन को कभी भी निजी लाभ के साधन के रूप में प्रयोग नहीं किया गया। उन्होंने सदैव निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान कर लोकनृत्य की परंपरा को भावी पीढ़ी तक पहुँचाया, भले ही इसके परिणामस्वरूप उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा हो।

उनकी अतुलनीय सेवाओं के लिए उन्हें राज्य, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया है, जिनमें बिहार कला श्री परिषद द्वारा नागार्जुन शिखर सम्मान, बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा बिहार कलाकार सम्मान, संगीत नाटक अकादमी का टैगोर सम्मान, बिहार सरकार द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, तथा भारत सरकार द्वारा प्रदत्त राष्ट्रीय टैगोर पुरस्कार उल्लेखनीय हैं। उन्हें बिहार के “कला और संस्कृति के 100 रत्नों” में भी सम्मिलित किया गया है।