पद्मश्री स्व. विश्वबंधु जी

Director,Surangan
Director, Surangan

पद्मश्री विश्वबंधु जी

बिहार के प्रख्यात लोकनर्तक और नृत्य गुरु स्वर्गीय विश्वबंधु को कला के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान के लिए वर्ष 2026 में मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है 
परिचय एवं जीवन
  • जन्म: 23 नवंबर 1930
  • निधन: 30 मार्च 2025 (95 वर्ष की आयु में)
  • मूल निवास: पटना (दानापुर/दाउदपुर), बिहार
  • प्रमुख कला शैली: पारंपरिक लोक नृत्य, विशेष रूप से ‘डोमकच’ नृत्य को पुनर्जीवित करने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय इन्हें जाता है। 
योगदान एवं उपलब्धियाँ
  • प्रशिक्षण: अपने जीवनकाल में 5,000 से अधिक शिष्यों और नर्तकों को नृत्य में पारंगत किया। 
  • प्रस्तुतियाँ: देश भर में 6,000 से अधिक मंचों और कार्यक्रमों में अपनी कला का प्रदर्शन किया। [
  • अन्य सम्मान: इन्हें पद्म पुरस्कार के अलावा बिहार सरकार के लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी राष्ट्रीय टैगोर पुरस्कार से भी नवाजा गया था

     

     

संस्थान की स्थापना 

कलाकार विश्वबंधु ने लोक नृत्य के प्रचार-प्रसार करने को लेकर सुरांगन नामक संस्था की स्थापना 1959 में किया था। विश्वबंधु का जन्म 23 नवंबर 1930 को एवं निधन 30 मार्च 2025 को हुआ।

बचपन से लोक नृत्य के प्रति रूचि रखने वाले विश्वबंधु ने नृत्य गुरु पंडित उदय शंकर तथा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा पंडित रामजीवन प्रसाद से प्राप्त की।

शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे बिहार के ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक लोक नृत्यों का प्रचार-प्रसार कर समृद्ध किए। संस्था के जरिए देश-विदेश में सांस्कृतिक कार्यक्रम छह हजार से अधिक प्रदर्शित कर चुके थे।

1962 में कांग्रेस अधिवेशन में ग्रामीण विकास पर आधारित नृत्य नाटिका ये भारत के गांव की प्रस्तुति की गई थी। जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की सराहना प्राप्त हुई थी।

चीनी आक्रमण के समय नृत्य नाटिका ई हमर हिमालय का प्रदर्शन संपूर्ण भारतवर्ष में जन जागृति एवं जन चेतना लाने के लिए किया गया था।

नृत्य नाटकों का किया निर्देशन 

विश्वबंधु ने नृत्य एवं संगीत की परंपरा को बरकरार रखने के लिए नृत्य शैली का निशुल्क प्रशिक्षण युवा पीढ़ियों को देते रहे। वे पटना स्थित भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के मंच से अनेक नृत्य नाटकों का निर्देशन किया।
उनके अतुलनीय सेवाओं के लिए उन्हें राज्य, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया। बिहार सरकार की ओर से 2013 में लाइफ टाइम पुरस्कार, 2012 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार समेत अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें बिहार के कला और संस्कृति के 100 रत्नों में भी शामिल किया गया।

इप्टा से रहा नाता

विश्व बंधु इप्टा से भी जुड़े रहे और उन्होंने बिहार की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया। बिहार में इप्टा आंदोलन से जुड़े रहे। शुरुआती दिनों में इप्टा बैले टीम के साथी रहे। उन्होंने लोक नृत्यों के जरिए अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया। लंबे समय तक पटना इप्टा के संरक्षक रहे। उम्र की बाधा को पाटते हुए इप्टा की सरगर्मियों में सहयोग किया। इप्टा की स्थापना के साठ वर्ष पूरे होने पर बिहार इप्टा की ओर से विश्व बंधु को इप्टा हीरक जयंती सम्मान से नवाजा गया था। कालांतर में विश्व बंधु ‘सुरांगन’ नाम संस्था की स्थापना किए थे। संस्था के माध्यम से बिहार के लोक नृत्य को राष्ट्रीय ख्याति उन्होंने दिलाई। बिहार में लोकनृत्य के विकास और संवर्धन में अनिवर्चनीय योगदान दिया। उन्हें बिहार सरकार की ओर से लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड और भारत सरकार के संगीत नाटक अकादमी की ओर से टैगोर अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

नृत्य की सेवा करते रहे’

विश्व बंधु शास्त्रीय नृत्य के भी अच्छे जानकार रहे। उन्होंने बिहार के श्रमकार्य और खेतीबारी, पर्व त्योहारों के गीतों पर आधारित लोकजीवन के पदचापों को सम्मान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। सुरांगन संस्था की स्थापना कर सात दशकों तक उन्होंने सैकड़ों लोकनर्तक तैयार किए। तिल्लोत्तमा, हिरण- हिरणी, बिहार गौरव गान समेत अनेक नृत्य नाटिकाओं का उन्होंने निर्देशन किया। देश भर में उन्होंने अपने नृत्य का प्रदर्शन किया। उन्होंने लोक नृत्य शैली डोमकच को भी बढ़ावा दिया।

क्या है डोमकच?

बिहार, झारखंड और नेपाल के अलावा मिथिला के लिए भी कहा जाता है कि डोमकच एक प्रसिद्ध नृत्य शैली है। जो मुख्य रूप से विवाह उत्सव के दौरान की जाती है। ये एक सामूहिक नृत्य है, जिसमें महिला और पुरुष अर्धवृत्त बनाकर या एक दूसरे की कमर पकड़कर हास्य व्यंग्य से भरे गीतों पर नाचते हैं। ये नृत्य मुख्य रूप से शादी- ब्याह के समय खासकर जब बारात निकल जाती है, तो घर पर रुकी हुई महिलाओं के द्वारा रात भर प्रस्तुत किया जाता है। इसमें महिलाएं एक दूसरे का हाथ पकड़कर एक दूसरे से मजाक करती हैं। गाली के साथ मजाक भी होता है। नृत्य में मांदर, ढोलक, झांझ और टिमकी जैसे वाद्य यंत्रों को रखा जाता है।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु  के हाथों विश्वबंधु जी की पत्नी इंदु देवी जी ने पुरस्कार ग्रहण किया।
विश्वबंधु जी बिहार के लोक नृत्य के स्तंभ माने जाते हैं। पंडित उदय शंकर व पंडित राम जीवन प्रसाद से नृत्य की बारीकियों से अवगत हुए।

उन्होंने बिहार के पारंपरिक लोक नृत्यों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके शिष्य जितेंद्र कुमार ने बताया कि विश्व बंधु लोक नृत्य के एक अग्रणी प्रवर्तक और बिहार के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक व्यक्तियों में से एक थे।

वे एक प्रख्यात नर्तक, कोरियोग्राफर, गुरु और संस्था निर्माता के रूप में अपना पूरा जीवन भारतीय नृत्य परंपराओं के संरक्षण, पुनरुद्धार और रचनात्मक पुनव्याख्या के लिए समर्पित कर दिया।

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